हिंदी का होता बहुत, भारत में गुणगान। हिंदी भाषा हिंद की, जगत बनी पहचान।। जगत बनी पहचान, बहुत मृदु हिंदी भाषा। शब्दों में संसार, हिंद की हिंदी आशा।। हिंदी के सर ताज, भाल पर सोहे बिंदी। छंद बंध अनुराग, बहुत प्यारी है हिंदी।। सुरेश चंद्रा
आतंकी तक कह दिया, जो थे बच्चे नेक। वाणी पर संयम नहीं, खोया सकल विवेक।। खोया सकल विवेक, शर्म इनको नहि आती। मुख मीठी मुस्कान, पीटकर कहते छाती।। कहि सुरेश कविराय, बात जो करते मन की। नहीं करें सम्मान, सुने ना ये जन मन की।।
"राजनीतिक संवादों में जब मर्यादा और तर्क की जगह अंधभक्ति और हिंसा ले ले, तो समाज का ताना-बाना बिखरने लगता है। जहाँ रक्षक ही भक्षक बनकर आस्था और विश्वास को लूटने लगें, वहाँ न्याय की बुनियादी हवा भी ज़हरीली महसूस होने लगती है। आइए, इसी कड़वे सच से साक्षात्कार कराती यह रचना सुनें..." आज विषैली हो गयी, राजनीति की बात, अंधभक्त हाबी हुये, चलते घूँसा लात। चलते घूँसा लात, झूँठ को साँच बताते, कहते चौकीदार, लूट मंदिर को खाते। कहि सुरेश कविराय, अनीती इनकी शैली, न्यायालय में गंध, फैलती आज विषैली।। #कुंडलियाँ #हिंदीसाहित्य #सुरेशकविराय
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