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जन्मा ले प्रारब्ध को



जन्मा ले प्रारब्ध को,  नहीं क्षुब्ध प्रारब्ध।
अक्षर पहले से बने, स्वर वर्णों से शब्द।।
स्वर वर्णों से शब्द, भाग्य कर्मों की स्याही।
सत कर्मों की नेक, असल प्रारब्ध कमाई।।
कहि सुरेश कविराय, कौन है जगत अजन्मा।
पहले से प्रारब्ध, बाद में प्राणी जन्मा।।

#कुंडलियाँ #हिंदीसाहित्य #सुरेशकविराय

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