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आतमा है परदेशी


 इक परदेशी आतमा, दूजा पत्ता जान। 

पत्ता टूटा शाख से, तन से निकले प्रान।। 

तन से निकले प्रान, कभी नहि वापिस आये। 

पत्ता का वहि हाल, शाख से जुड़ ना पाये।। 

कहि सुरेश कविराय, बात अपनी संदेशी। 

पत्ता है महमान, आतमा है परदेशी।।

सुरेश कविराय

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