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कोई नहीं उपाय




दानी यदि अभिमान का, बनता है पर्याय। 

पायेगा अपमान को, कोई नहीं उपाय।।

कोई नहीं उपाय, पुण्य निज काम न आवै। 

किया धरा बेकार, और अपयश को पावै।। 

कहि सुरेश कविराय, न बनना तुम अभिमानी। 

मिलता लेख बिलेख, कर्ण सा को जग दानी।।

सुरेश कविराय

अभिमान के खतरों को इतनी अच्छी तरह से बताया गया है! जब दान में भी अभिमान आ जाता है, तो अपमान निश्चित है। और जब अपमान होता है, तो कोई उपाय नहीं बचता।

सुरेश कविराय जी ने कर्ण का उदाहरण देकर समझाया है कि अभिमान कितना खतरनाक हो सकता है। कर्ण जैसे महान दानी को भी अभिमान ने अपयश दिलाया।


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