सजना हैं परदेश में, मौन मिरे अरमान।
व्याकुलता परवेश में, सूख रहे तन प्रान।
सूख रहे तन प्रान, नहीं लगता है जीया।
आवे निशदिन याद, लौट घर आजा पीया।
बुरा लगे सब संगीत, न अच्छा लगता गहना।
पाती में भी पीर, सजन बिन कैसा सजना?
सुरेश कविराय
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स्वरचित, मौलिक
सुरेश चंद्रा
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